सोमवार, 26 जनवरी 2026

437. वेवेल योजना

राष्ट्रीय आन्दोलन

437. वेवेल योजना

प्रवेश

सितंबर 1943 में वेवेल वायसराय बना। उसने जुलाई 1941 से जून 1943 तक कमांडर-इन-चीफ, भारत के रूप में काम किया और फिर फरवरी 1947 में रिटायर होने तक भारत के वायसराय के रूप में काम किया। लॉर्ड माउंटबेटन ने 1947 में लॉर्ड वेवेल की जगह भारत के वायसराय का पद संभाला था। उसने चर्चिल को पत्र लिखकर कहा, संभावित विश्व-जनमत और आम ब्रिटिश दृष्टिकोण को देखते हुए युद्ध के बाद अंग्रेज़ों के लिए भारत पर बलपूर्वक अधिकार जमाए रखना संभव नहीं होगा। बल्कि युद्ध समाप्त होने के पहले ही संधि-वार्ता आरंभ करना बुद्धिमानी होगी। यह तभी हो सकता है कि हम कांग्रेस को पहले ही किसी अन्य लाभप्रद दिशा में मोड़ दें, अर्थात उन्हें भारत की प्रशासनिक और संवैधानिक समस्याओं के समाधान ढूंढ़ने में लगा दें। यह स्पष्ट था कि ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ यह अनुभव करने लगे थे कि सत्ता का समझौते के बाद हस्तांतरण कर दिया जाए। वेवेल चाहता था कि केंद्र में कांग्रेस और लीग के सहयोग से अस्थायी सरकार बना ली जाए। इससे उसे दुहरा लाभ मिलता, एक ओर युद्ध प्रयासों में भारतीयों का अधिक सहयोग मिलता और दूसरी तरफ भारतीयों की शक्ति को आंदोलनों से हटाकर अपने लिए अधिक लाभप्रद दिशा में मोड़ देता। वायसराय का प्रस्ताव कांग्रेस की न्यूनतम मांगों को भी पूरा नहीं करता था। कांग्रेस की मांग थी कि एक सचमुच राष्ट्रीय सरकार की स्थापना हो जाए जो असेंबली के प्रति उत्तरदायी हो तथा युद्ध के पश्चात स्वाधीनता प्रदान करने का तुरंत वादा किया जाए।

विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय

1945 के आने के साथ विश्वयुद्ध भी अपने अंतिम चरण में पहुंच गया था। मित्रराष्ट्रों की विजय लगभग निश्चित हो चुकी थी। सान फ़्रांसिस्को सम्मेलन की घोषणा हो चुकी थी, जहां युद्ध से क्षत-विक्षत दुनिया के भविष्य पर चर्चा की जानी थी। जापान पर परमाणु बम गिराए जाने की घटना से दुनिया में अशांति फैल रही थी। युद्ध के अपराधियों पर मुक़दमा चलाने की आवाज़ भी उठने लगी थी। इस विषय पर गांधीजी ने कहा था, एक अहिंसक मनुष्य के नाते मैं व्यक्तियों को दंड देने में विश्वास नहीं रखता। ये युद्ध का अपराधी क्या होता है? क्या युद्ध स्वयं ईश्वर और मानवता के विरुद्ध अपराध नहीं है? जिन लोगों ने युद्ध की स्वीकृति दी, उसकी योजना बनाई और उसका संचालन किया, वे सब क्या युद्ध के अपराधी नहीं हैं? युद्ध के अपराधी केवल धुरी राष्ट्र में ही नहीं हैं। रुज़वेल्ट और चर्चिल क्या हिटलर  और मुसोलिनी से युद्ध के कम अपराधी हैं? हिटलर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का उत्तर मात्र है। केवल जर्मनी और जापान के ही नहीं, इंग्लैंड, अमरीका और रूस सबके हाथ ख़ून से थोड़े बहुत रंगे हैं।

गांधीजी ने मित्र राष्ट्रों को सलाह दी, शांति न्यायपूर्ण होनी चाहिए। लेकिन न्यायपूर्ण होने के लिए शांति न दंडमूलक होनी चाहिए और न ही प्रतिशोधमूलक। जर्मनी और जापान को अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। शक्तिशाली कभी प्रतिशोध नहीं लेते। शांति की उपलब्धियों का समान वितरण होना चाहिए। मित्र राष्ट्र आक्रामक स्थिति में थे। गांधीजी ने मित्र राष्ट्रों को यह याद भी दिलाया कि भारत की स्वाधीनता दुनिया की सभी शोषित जातियों को दिखाएगी कि उनकी स्वाधीनता बहुत पास है, और अब आगे किसी भी प्रकार उनका शोषण नहीं किया जा सकेगा।

भारत में कांग्रेस के अधिकांश प्रमुख नेता जेल के अंदर थे। पूरा राष्ट्र हताशा की स्थिति में शांत पड़ा हुआ था। गांधीजी जनता के मनोबल को बनाए रखने के लिए उन्हें रचनात्मक कार्यों से जोड़े रखने का भरपूर प्रयास कर रहे थे। वे लोगों को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाना चाह रहे थे। उनका मानना था कि दिल्ली जाने वाला ट्रंक रोड नहीं, बल्कि हरेक भारतीय गांव तक जाने वाली कच्ची पगडंडियां ही जनता को स्वराज तक पहुंचाएगी। देहातों की असहाय, गूंगी-बहरी, भूखी जनता का स्वशासन ही सही मायने में स्वराज है, न कि मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता या गोरों की जगह कालों के राज की स्थापना

देश में स्थिति विकट बनी हुई थी। हर जगह हिंसा और नफ़रत का अलाव सुलग रहा था। भारतीय अर्थव्यवस्था युद्ध की मांगों के कारण पूरी तरह तबाह हो चुकी थी। एक भयानक अकाल से बंगाल नष्ट हो चुका था। बेईमानों ने युद्ध के दौरान बेहिसाब मुनाफ़े कमाए थे। ग़रीब और ग़रीब हो गया था। अंग्रेज़ों की सरकार किसी क़ीमत पर युद्ध जीतना चाहती थी, इसलिए उसने जनकल्याण के किसी भी काम पर तवज्जो नहीं दी थी। वातावरण में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। ‘हिटलर जैसा रवैया’ रखने वाला चर्चिल गांधीजी की लोकप्रियता से चिढ़ता रहता था और उसने तो वेवेल से यहाँ तक पूछ डाला था कि ‘गाँधी अब तक मरा क्यों नहीं? मार्च 1945 में उसने वेवेल से कहा था, जब तक हो सके भारत के मामले को वह लटकाए रखे। वह चाहता था कि भारत - पाकिस्तान, हिन्दुस्तान और प्रिन्सिस्तान में बाँट जाए।

गतिरोध समाप्त करने का प्रयास

यूरोप में युद्ध कि दिशा बदल चुकी थी। धुरी राष्ट्र की पराजय निश्चित थी। ऐसा लग रहा था कि मित्र राष्ट्रों की फौजी कार्रवाई का केन्द्र भारत बनेगा। पाकिस्तान के प्रश्न पर हुई गांधी-जिन्ना वार्ता असफल हो चुकी थी। जन-आंदोलनों ने भारत में ब्रिटिश राज का चलते रहना असंभव कर दिया था। अंग्रेजों के बर्बरतापूर्ण दमनात्मक कार्रवाइयों के भय ने कांग्रेसी नेताओं को बातचीत और समझौते की नीति पर चिपके रहने को बाध्य कर दिया था। अँग्रेज़ यह प्रयास करते आए थे कि कांग्रेस और लीग केन्द्रीय सरकार के तत्कालीन गठन में भाग लें। ऐसे में तब के वायसराय लॉर्ड वेवेल को लगा कि अकाल से तबाह और असंतोष की आग में जल रहे भारत की तत्कालीन परिस्थितियों से भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों के सहयोग के बिना जूझना असंभव है। उसने केन्द्रीय विधान सभा के कांग्रेस दल के नेता भूलाभाई देसाई के कहा, राजनीतिक गतिरोध समाप्त करने के लिए मैं आपकी सहायता चाहता हूं। परिस्थितियाँ बहुत विषम हैं। यदि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संसदीय दल मिलकर राष्ट्रीय सरकार रचें, तो मैं उसका स्वागत करूंगा। भूलाभाई को लगा कि प्रस्ताव अच्छा है, और इससे कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों की रिहाई की संभावना बढ़ जाएगी।

भूलाभाई-लियाक़त अली करार

भूलाभाई देसाई ने लीग के विधान सभा के उप नेता नवाबज़ादा लियाक़त अली ख़ान से मुलाक़ात की। लियाक़त अली को भी लगा कि केन्द्र में कांग्रेस और लीग की सरकार न सिर्फ़ ज़रूरी है, बल्कि संभव भी है। उन्होंने यह बात जिन्ना को भी बताई। भूलाभाई गांधीजी से भी सेवाग्राम जाकर मिले और इस विषय पर उनसे चर्चा की। गांधीजी ने कहा कि चाहे उनकी सोच जैसी भी हो वे इस प्रस्ताव के विरुद्ध नहीं हैं। इस प्रकार केन्द्र में अंतरिम सरकार बनाने वाली 11 जनवरी, 1945 को भूलाभाई-लियाक़त अली करार हुआ। भूलाभाई ने वायसराय को इस करार के बारे में बताते हुए तुरंत कार्रवाई का अनुरोध किया।

इसी बीच जिन्ना का एक वक्तव्य अख़बारों के द्वारा गांधीजी की जानकारी में आया। इसमें कहा गया था कि गांधीजी कांग्रेस कार्यसमिति को एक ओर रखकर मिश्र-मंत्रिमंडल बनाना चाहते हैं। गांधीजी इस पर विरोध दर्ज़ करते हुए भूलाभाई से कहा, इसका ध्यान रखा जाए कि कांग्रेस कार्य-समिति की इजाज़त के बिना कुछ भी न किया जाए। बाद में लियाक़त अली ने इस बात से इंकार कर दिया कि उसके और भूलाभाई के बीच कोई करार हुआ है। जिन्ना ने भी घोषणा कर दी कि न तो उससे कोई सलाह ली गई है न ही वह किसी तरह से इसमें शरीक़ था। करार की प्रति पर भूलाभाई और लियाक़त अली दोनों के हस्ताक्षर थे। लियाक़त अली ने इसमें भी पेंच लगा दी और कहा, जो प्रति मुझे दी गई थी उस पर भूलाभाई के हस्ताक्षर थे, और जो मुझसे ली गई उस पर मेरे हस्ताक्षर थे। वे अच्छी तरह जानते हैं कि कोई करार नहीं हुआ है। केवल प्रस्ताव ही रखे गए थे जो चर्चा के आधार मात्र थे। इस प्रकार समझौता जन्म लेने के पहले ही अपनी मौत मर गया।

कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य जब रिहा हुए, तो उनकी बैठक हुई। उन्होंने इस करार को पसन्द नहीं किया। भूलाभाई के काम करने के ढंग को उन्होंने ग़लत समझा। जुलाई में जब शिमला सम्मेलन हुआ तो उन्हें उसमें शामिल नहीं किया गया। इससे भूलाभाई को काफ़ी आघात पहुंचा। कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन जो समझौता उन्होंने किया था, वही केन्द्र में राष्ट्रीय सरकार बनाने के लिए लॉर्ड वेवेल के प्रस्ताव की नींव बना।

नेताओं की जेल से मुक्ति

लॉर्ड वेवेल को भारत की स्थिति और आगे की संभावनाओं पर चर्चा के लिए लंदन बुलाया गया। जब वह लंदन में था, तभी 22 मई, 1945 को यूरोप का युद्ध समाप्त हुआ। लेबर पार्टी ने गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और 23 मई को ब्रिटेन की सम्मिलित सरकार का अंत हो गया। चर्चिल के नेतृत्व में कार्यवाहक सरकार ने ब्रिटेन के आम चुनावों के लिए 5 जुलाई की तारीख़ निश्चित कर दी। टोरियों को आसीन चुनावों में मद्देनज़र यह लगा कि भारत की वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता। गांधीजी के अहिंसक संग्रामों ने इंग्लैंड में उनके प्रति सद्भावना काफी बढ़ाई थी। इसलिए वहां के  राजनीतिक दल भारत के प्रति अपने रुख को नरम कर इसका लाभ उठाना चाहते थे। प्रधानमंत्री चर्चिल ने भारत में संवैधानिक सुधारों की दिशा में नए प्रयास आरंभ किए। प्रधानमंत्री के परामर्श पर 14 जून को वायसराय लॉर्ड वेवेल ने घोषणा की कि 1935 के भारतीय सरकार अधिनियम के ढांचे के भीतर रहकर वैधानिक परिवर्तन करने का प्रयत्न किया जाएगा। इस घोषणा के अनुसार सरकार ऐसी राष्ट्रीय सरकार बनाने का प्रयत्न करेगी जो वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का स्थान ले सके। उस कार्यकारिणी में हिन्दुओं और मुसलमानों के बराबर सदस्य होंगे। 14 जून को हुई इस घोषणा के साथ कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों को चौंतीस महीने के कारावास के बाद मुक्त कर दिया गया। इसके साथ ही वायसराय लॉर्ड वेवेल ने 25 जून को शिमला में एक सम्मेलन के आयोजन की घोषणा भी की, जिसमें सभी दलों के नेताओं को वार्तालाप के लिए निमंत्रित किया जाएगा।

इधर जेल जीवन से आज़ाद हुए नेताओं ने यह मान लिया था कि अंग्रेज़ों के दमन के कारण देश की जनता का मनोबल टूट चुका होगा, लेकिन यह देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि लोग उनके स्वागत के लिए पूरे दिल और जान से खड़े थे। उनके दिलों में ब्रिटिश विरोधी भावना और भी प्रबल हो चुकी थी। वे कुछ कर गुज़रने के लिए अधीर थे। नेहरूजी का स्वागत करने के लिए अल्मोड़ा जेल के बाहर बड़ी भारी संख्या में लोग मौज़ूद थे। यही हाल मौलाना आज़ाद के स्वागत के लिए बांकुड़ा जेल के बाहर था। बंबई में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक के समय नेताओं के स्वागत के लिए भारी बारिश के बावज़ूद पांच लाख की भीड़ इकट्ठी हो गई थी।

लीग की स्थिति

हालांकि गांधी-जिन्ना वार्ता टूटने से लीग और कांग्रेस की असेंबली पार्टियों के बीच सहयोग पर प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन जनवरी 1945 में लीग की स्थिति कमज़ोर पड़ गई। कांग्रेसी विधायकों के जेल से रिहा होते ही पश्चिमोत्तर प्रांत में लीग की सरकार गिर गई। कांग्रेस कार्य समिति के निर्णय के अनुसार डॉ. ख़ान के मंत्रिमंडल ने 1939 में इस्तीफ़ा दे दिया था। 1943 में प्रान्त के गवर्नर ने सरदार औरंग़ज़ेब ख़ा के नेतृत्व में मुस्लिम लीग की सरकार बनवा दी। उसे उस समय 50 सदस्यों को विधान सभा में सिर्फ़ 20 सदस्यों का समर्थन प्राप्त था। कांग्रेसी सदस्य भारत छोड़ो आन्दोलन के सिलसिले में जेल में बन्द थे। सरदार औरंग़ज़ेब ख़ा ने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दी और लोगों के बीच काफ़ी अप्रिय हो चुका था। कांग्रेस के सदस्य जब जेल से छूट कर आए तो विधान सभा में मुस्लिम लीग अल्पमत में आ गई। वहां डॉ. ख़ान साहब के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। 1944 में ही पंजाब में ख़िज़्र हयात ख़ान की यूनियनिस्ट पार्टी वालों ने जिन्ना से संबंध तोड़ लिया था। मार्च 1945 में बंगाल में निज़ामुद्दीन सरकार गिर गई। सिंध और असम में भी लीग ने कांग्रेस के समर्थन से जैसे-तैसे सरकार संभाले रखी थी।

शिमला कॉन्फ्रेंस

जब इंग्लैण्ड में चुनावों के लिए केवल एक महीना रह गया तब अंततः जून 1945 में चर्चिल ने वेवेल को भारतीय नेताओं के साथ संधि-वार्ता करने की अनुमति दे दी। कंजरवेटिव दल के सदस्य भारत से संबंधित समस्या के किसी समाधान पर पहुंचने पर ईमानदार दिखना चाहते थे। भारतीय नेताओं के परामर्श से नए संविधान की तैयारी के लिए वायसराय के कार्यकारी काउन्सिल का पुनर्गठन करने के प्रश्न पर वेवेल द्वारा शिमला में कांफ्रेंस बुलाया गया। इस संधि-वार्ता का उद्देश्य सांप्रदायिक समस्या को सुलझाना और संवैधानिक गतिरोध को दूर करना था। वायसराय लॉर्ड वेवेल ने गांधीजी को भी शिमला बुलाया। हालाकि गांधीजी कांग्रेस के सदस्य नहीं थे, फिर भी लॉर्ड वेवेल के बुलावे पर शिमला गए लेकिन उन्होंने विचार-विमर्श में भाग नहीं लिया। गांधीजी ने निमंत्रित लोगों की लिस्ट देखी तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ कि कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना आजाद  निमंत्रित ही  नहीं किए गए है। उन्होंने वायसराय को पत्र लिखा, मैं तो कांग्रेस का 1934 से सदस्य ही नहीं हूं। मैं कांग्रेस के पक्ष से कोई राय नहीं रख सकता। व्यक्तिगत तौर पर अगर आपको मेरी राय की ज़रूरत हो  तो  वहाँ रहूंगा लेकिन कांग्रेस की राय जानने के लिए बेहतर हो कि आप कांग्रेस  अध्यक्ष को आमंत्रित करें। वायसराय की तरफ़ से मौलाना आज़ाद को तुरंत निमंत्रण भेजा गया। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी नेताओं को रिहा कर दिया गया था। जिन नेताओं को कल तक राजद्रोही कहा जाता था, उन्हें सम्मानपूर्वक स्पेशल ट्रेन से वायसराय से विचार-विमर्श के लिए वातानुकूलित श्रेणी द्वारा शिमला भेजा गया।

वेवेल योजना

25 जून से 14 जुलाई तक चर्चाएं चलीं। वार्ता के बाद वेवेल ने अपनी योजना प्रस्तुत की, जिसे ‘वेवेल योजना’ कहा जाता है। वायसराय ने अपने भाषण में स्वराज का उल्लेख नहीं किया। एक नई एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल की स्थापना का प्रस्ताव भी उसने पेश किया। इसमें स्वयं वायसराय और कमाडर-इन-चीफ़ के अतिरिक्त सभी विभाग भारतीयों को सौंपने की योजना रखी गई। वायसराय ने अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करने का भी आश्वासन सिया। युद्ध जीत लेने के बाद नए संविधान पर विचार-विमर्श के लिए द्वार खुले रहेंगे, ऐसा कहा गया। रक्षा मामलों को छोड़कर शेष सभी मामले  भारत को दिए जाएंगे। सीमान्त और कबीलाई क्षेत्रों को छोड़कर अन्य सभी विदेशी  मामले भारतीयों के पास होंगे। भारत मन्त्री का भारतीय शासन पर नियन्त्रण रहेगा, परन्तु वह भारत के हित में कार्य करेगा। भारत में ब्रिटेन के वाणिज्यिक तथा अन्य हितों की देखभाल के लिए एक उच्चायुक्त की नियुक्ति की जाएगी। पुनर्निर्मित परिषद को 1935 के अधिनियम के ढांचे के भीतर एक अंतरिम सरकार के रूप में कार्य करना था (अर्थात केंद्रीय विधानसभा के लिए जिम्मेदार नहीं)। लेकिन वायसराय ने यह घोषणा ज़रूर कर दी कि परिषद् में हिंदू और मुसलमान, दोनों गुटों को एक स्तर (पैरिटी) का महत्त्व दिया जाएगा। यानी सवर्णों और मुसलमानों को सामान प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई। यह सरासर अन्याय था। देश की अस्सी प्रतिशत जनता को बीस प्रतिशत के बराबर तौला जा रहा था। गांधीजी के विरोध के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद ने वायसराय के पैरिटी वाले सुझाव को स्वीकार कर लिया। इसका मतलब स्पष्ट था, कांग्रेस सवर्ण हिंदू संस्था मान ली गई और मुस्लिम लीग मुस्लिम प्रतिनिधि संस्था स्वीकार हो गई।

वेवेल योजना के अनुसार विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों को कार्यकारी परिषद में नामांकन के लिए वायसराय को एक संयुक्त सूची प्रस्तुत करनी थी। यदि संयुक्त सूची संभव नहीं होती, तो अलग-अलग सूचियाँ प्रस्तुत की जानी थीं। वायसराय काउन्सिल में, भारतीयों का चयन, सभी दलों द्वारा तैयार की गई सूचियों में से, वायसराय द्वारा किया जाना था। जिन्ना ने कोई लिस्ट नहीं सौंपी। उसने कहा कि उसे अपनी पार्टी में बात करनी होगी उसे। उसे पन्द्रह दिनों का समय दिया गया। कांग्रेस ने अपनी लिस्ट सौंप दी। पन्द्रह नामों की कांग्रेस द्वारा सौंपी गई लिस्ट, जिसमें तीन मुस्लिम लीग के सदस्य (1. जिन्ना, 2. नवाब मोहम्मद इस्माइल खां, 3. लियाक़त अली) भी थे, जिन्ना को मान्य नहीं था। इसमें कांग्रेस के पांच सदस्य थे, जिसमें से दो मुस्लिम थे (4. मौलाना आज़ाद, 5. आसफ़ अली, 6. नेहरू, 7. सरदार पटेल, 8. राजेन्द्र प्रसाद)। इसके अलावा हिन्दू महा सभा के एक (9. श्यामा प्रसाद मुखर्जी), एक हिन्दू (10.गगन बिहारी मेहता), एक ईसाई (11. राजकुमारी अमृत कौर), एक सिख (12. नाम बाद में दिया जाएगा), एक पारसी (13. सर आरदेशिर दलाल), एक अनुसूचित जाति (14. मुनिस्वामी पिल्लै) और अनुसूचित जनजाति (15. राधानाथ दास) के सदस्यों का भी प्रतिनिधित्व दिया गया था।

यहां पर जिन्ना फिर से अड़ गया। उसने मांग कर दी कि एक ओर अकेले मुसलमान सदस्य और दूसरी ओर अन्य सारे लोगों का प्रतिनिधित्व एक साथ होगा। उसका तर्क था कि मुस्लिम लीग को यदि पचास प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलेगा तभी मुसलमानों के हितों का रक्षण होगा। जिन्ना की इच्छा नहीं थी कि अंतरिम सरकार में मुस्लिम मंत्री सहयोग दें। उसे आशंका थी कि यदि अंतरिम सरकार सफल हो गई, तो पाकिस्तान की मांग ढीली पड़ जाएगी। उसने अंतरिम सरकार में मुसलमानों की सूची देने से इंकार कर दिया। जिन्ना की मांग थी कि सभी मुसलमान सदस्यों को चुनने का एकमात्र अधिकार लीग को ही हो।

सम्मेलन असफल रहा

14 जुलाई को जब कॉन्फ्रेंस की अन्तिम बैठक हुई, तो वेवेल ने घोषणा की कि मुस्लिम लीग की लिस्ट के बिना उसने लिस्ट को अंतिम रूप दे दिया है। उसने यह विश्वास भी व्यक्त किया कि एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल की यह लिस्ट सबको मान्य होगी। लेकिन जो मुस्लिम नाम उसने सुझाए थे, वह जिन्ना को स्वीकार्य नहीं था। कांग्रेस द्वारा मांगने के बावज़ूद यह लिस्ट कांग्रेस को नहीं दिखाई गई। वेवेल ने इस लिस्ट को सम्मेलन द्वारा बहस और पास करने के लिए भी नहीं रखा और घोषणा कर दी कि सम्मेलन असफल रहा और यथास्थिति बनी रहेगी। शिमला सम्मेलन असफल रहा। गांधीजी ने वेवेल को लिखा, मुझे यह देख कर दुख होता है कि जो सम्मेलन इतने प्रसन्न और आशापूर्ण वातावरण में शुरू हुआ था, वह असफल हो गया। इस सम्मेलन की असफलता में लॉर्ड वेवेल का भी कम हाथ नहीं था। उसने ही तो पैरिटी का सिद्धांत बनाया था। उसके ही प्रोत्साहन पर जिन्ना ने इतना कड़ा रुख अपना लिया था।

जिन्ना को बढ़ावा

जिन्ना की मांगों के कारण सम्मेलन को भंग करके वेवेल ने वस्तुतः जिन्ना को ही बढ़ावा दिया। जिन्ना ने कहा था, वेवेल योजना मुस्लिम लीग के लिए एक मोहजाल और मृत्युदंड का वारंट था। ... अनुसूचित जातियां, सिख और ईसाई आदि दूसरे सारे अल्पसंख्यक समुदायों का वही लक्ष्य है जो कांग्रेस का है। शिमला सम्मेलन के बाद मुसलमानों को लगने लगा कि ताक़त जिन्ना के पास है। पंजाब में जो ज़मीं खिज्र हयात के पास थी वह जिन्ना की ओर खिसक गई। जिन्ना ने आरोप लगाया कि, कांग्रेस के हिन्दू राज में मुसलमानों का वही हाल होगा जो जर्मनी में यहूदियों का हुआ था। मैं कभी भी मुसलमानों को हिन्दू का गुलाम नहीं बनने दूंगा। जब समय आएगा तो मैं हिचकूंगा नहीं और एक भी कदम वापस नहीं खींचूंगा। गांधीजी और कांग्रेस ने हमें रौंदने की पूरी कोशिश की, लेकिन इस धरती का कोई भी आदमी मुस्लिम लीग को नहीं कुचल सकता। जब क़ुरबानी देने का समय आएगा, तो सबसे पहले मैं अपने सीने पर गोली खाऊंगा। इसका असर मुस्लिम समुदाय पर हुआ। अपनी ताक़त का भान होते ही जिन्ना ने अपने तौर-तरीक़े में वृद्धि कर दी। वह ज्यादा निरंकुश होता गया। लोगों पर उसने रौब जताना शुरू कर दिया। वह अधिक रूढ़िवादी भी दिखने की कोशिश करता। अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ने के लिए उसने ‘डॉन’ नामक दैनिक अखबार निकला।

इंग्लैंड के चुनाव के बाद

जुलाई 1945 में इंग्लैंड में आम चुनाव हुए। चर्चिल की टोरी पार्टी हार गई। लेबर पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और लेबर पार्टी की सरकार बनी। क्लिमेंट एटली प्रधानमंत्री बने। इंग्लैंड में ऐसी उम्मीद की गई कि जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी इंग्लैंड के शासक भारत को सत्ता सौंप देने का प्रयास करेंगे। लेकिन शीघ्र ही यह एहसास हो गया कि सरकार तो बदल गई लेकिन दृष्टिकोण नहीं। विदेश सचिव बेविन साम्राज्यवादी था और भारत छोड़ने का विचार नापसंद करता था। लेकिन विश्व पटल पर तेज़ी से परिवर्तन हो रहा था और उसका असर भारत पर भी दिख रहा था। नाज़ी जर्मनी का ध्वंस हो चुका था। अगस्त 1945 में हिरोशिमा की घटना के बाद जापान ने भी समर्पण कर दिया था। पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में सरकारें बन रही थीं। चीन में क्रांति आगे बढ़ रही थी। वियतनाम और इंडोनेशिया में साम्राज्यवादी विरोध की लहर बह रही थी। ब्रिटेन की सेना युद्ध से थक चुकी थी। वहां की अर्थ-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। ऐसी स्थिति में ब्रिटेन का पीछे हटना तय था। एटली सरकार ने वेवेल को नए सिरे से बातचीत करने का आदेश दिया। 21 अगस्त 1945 को नए चुनावों की घोषणा की गई। यह भी कहा गया कि चुनावों का कराया जाना आंदोलनकारियों को संवैधानिक गतिविधियों का अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में पहला कदम है। 19 सितंबर को वेवेल ने शीघ्र ही पूर्ण स्वशासन के लक्ष्य की प्राप्ति के वादे को दुहराया। चुनावों के बाद विधायकों और भारतीय रजवाड़ों के साथ संविधान निर्मात्री सभा के गठन पर बातचीत करने का वादा किया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल जिसे सभी प्रमुख दलों का समर्थन प्राप्त होगा, को स्थापित करने की दिशा में नए सिरे से प्रयास किए जाएंगे।

उपसंहार

वेवेल योजना पर हुई संधि-वार्ता के टूटने की घोषणा ने लीग को आभासी वीटो दे दिया। शिमला सम्मेलन का परिणाम यह निकला कि अब से बाद की होने वाली राजनीति में सवर्ण हिन्दू और मुसलमान समान संख्या का सूत्र दाखिल हो गया। दूसरी और प्रमुख बात यह हुई कि स्वाधीनता के जन्म के समय धार्मिक विभाजन के सिद्धान्त को सरकार की मान्यता प्राप्त हो गई। वेवेल की इस योजना ने लीग की स्थिति को मजबूत किया, जैसा कि 1945-46 के चुनावों से स्पष्ट था। जहां एक ओर इससे जिन्ना की स्थिति को बढ़ावा मिला वहीँ दूसरी ओर इसने चर्चिल की रूढ़िवादी सरकार के असली चरित्र को उजागर किया। चर्चिल अगर चाहता तो अस्सी प्रतिशत बहुमत वाली प्रजा को शासन सौंपकर सत्ता से अलग हो जाता। मुस्लिम लीग अपनी गैरजिम्मेदारी में देश की आज़ादी के साथ खिलवाड़ करती रही और वायसराय कांग्रेस को धोखा देता रहा। एशिया के मानचित्र पर पाकिस्तान की रूप-रेखा उभर चुकी थी।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

436. आज़ाद हिंद फ़ौज

राष्ट्रीय आन्दोलन

436. आज़ाद हिंद फ़ौज



1945

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की गिरफ़्तारी

विदेश में ब्रिटेन के विरुद्ध कड़ा संघर्ष ज़ारी रखने की प्रेरणा मुख्यतः सुभाषचंद्र बोस के साहसिक अभियानों से मिली। द्वितीय युद्ध के शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को जुलाई, 1940 में भारत सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर लिया। उन्हें प्रेसीडेंसी जेल में रखा गया। जेल में नेताजी ने अनशन आरंभ कर दिया। उनकी स्थिति बिगड़ने लगी। उनके ख़राब स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें जेल से निकालकर एल्गिन रोड वाले मकान में नज़रबंद कर दिया गया। 17 जनवरी, 1941 को नेताजी पुलिस की नज़रबंदी से भाग निकलने में क़ामयाब हो गए।

नेताजी जर्मनी में

भारत छोड़कर वे अफ़गानिस्तान और रूस होते हुए बर्लिन (जर्मनी) पहुंचे। वह धुरी-राष्ट्रों के सहयोग से भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त कर भारत की आज़ादी का स्वप्न देख रहे थे। बर्लिन सरकार के सहयोग से उन्होंने बर्लिन रेडियो से अंग्रेज़ विरोधी प्रचार आरंभ किया। उन्होंने जर्मनी में भारतीय युद्धबंदियों के सहयोग से आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन का सुझाव रखा। इस प्रस्ताव को जर्मन सरकार ने स्वीकार कर लिया।

इंडियन लीग की स्थापना

1941 में उन्होंने बर्लिन में इंडियन लीग की स्थापना की। जर्मनी में बोस को नेताजी की उपाधि मिली। नेताजी ने जर्मनी की सहायता से रूस होकर भारत पर आक्रमण की योजना बनाई। भारतीय सैनिकों के दो दस्ते का गठन किया। रोम और पेरिस में उन्होंने स्वतंत्र भारत केंद्र स्थापित किए। परन्तु उन्हें पर्याप्त जर्मन सहायता नहीं मिल पाई। जर्मनों ने ‘इंडियन लीग’ को रूस के विरुद्ध प्रयुक्त करने का प्रयास किया। यह नेताजी को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया जाने का निश्चय किया।

आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन

इस बीच जापान की युद्ध में तेज़ी से विजय मिलने लगी। सिंगापुर, मलाया और बर्मा अंग्रेज़ों के हाथ से निकल गए। भारत भी अब जापानियों के लक्ष्य में था। आज़ाद हिंद फौज का ख़्याल सबसे पहले मोहन सिंह के मन में मलाया में आया। वे ब्रिटेन की भारतीय सेना के अफ़सर थे। ब्रिटिश सेना पीछे हट रही थी। मोहन सिंह ने पीछे हट रही ब्रिटिश सेना में शामिल न होने का फैसला किया और इसके बजाय मदद के लिए जापानियों के पास गए। जैसे ही सिंगापुर पर जापानियों का क़ब्ज़ा हुआ, जापानियों ने भारतीय युद्ध-बंदियों को मोहन सिंह के सुपुर्द कर दिया। उन्होंने फिर उन्हें इंडियन नेशनल आर्मी में भर्ती करने की कोशिश की। हथियार डालने वाले 60 हज़ार भारतीय सैनिकों में से 40 हज़ार सैनिक कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में फ़ारेर पार्क में जमा हुए और उन्होंने आईएनए में शामिल होकर ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ लड़ने का फ़ैसला किया। आईएनए में शामिल होने के पीछे ब्रिटिश सरकार से लड़ने की इच्छा तो थी ही, इसका एक और कारण जापानी जेलों की बहुत बुरी दशा भी थी। उस ज़माने में जापान की जेलों में युद्धबंदियों की मृत्यु दर 27 फ़ीसदी थी जबकि ब्रिटेन और फ्रांस की जेलों में बंद जर्मन और इतालवी युद्धबंदियों की मृत्यु दर सिर्फ़ 4 फ़ीसदी थी।

 उन्होंने इसी समय रासबिहारी बोस के साथ टोक्यो में भारतीय युद्ध बंदियों की सहायता से आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन का निर्णय किया। लगभग 40 हज़ार लोग आज़ाद हिंद फौज में शामिल होने की इच्छा जता चुके थे। मोहन सिंह ने फ़ौज का विधिवत गठन किया। इसके प्रधान सेनापति बने। यह बड़े ही सुखद आश्चर्य की बात है कि युद्धकाल में भारतीय सेना के जिन सैनिकों ने जापान के आगे हथियार डल दिए थे, उन्हीं के द्वारा भारतीय राष्ट्रीय सेना – आज़ाद हिंद फ़ौज - इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की गई। 1 सितंबर 1942 को आज़ाद हिन्द फौज की पहली डिविजन का गठन 16,300 सैनिकों को लेकर किया गया। जापानी तब तक भारत पर हमला करने के बारे में सोचने लगे थे। दिसंबर 1942 तक आज़ाद हिंद फौज की भूमिका के बारे में जापानी और भारतीय अधिकारियों में गहरे मतभेद हो गए। मोहन सिंह और निरंजन सिंह गिल को गिरफ़्तार कर लिया गया। जापानी चाहते थे कि भारतीय फौज 2,500 सैनिकों की प्रतीकात्मक हो, जबकि मोहन सिंह का लक्ष्य 20,000 सिपाहियों का था।

आज़ाद हिंद फौज का दूसरा चरण

बैंकॉक में जून, 1942 में आज़ाद हिंद फौज का सम्मेलन हुआ। इसमें नेताजी को जापान आने का निमंत्रण मिला। इसमें सुभाष जी ने भारतीय सैनिकों की सहायता से अंग्रेज़ों से युद्ध करने का सुनहरा मौका देखा। वे 2 जुलाई 1943 को जर्मन और जापानी पनडुब्बी द्वारा जर्मनी से जापानी नियंत्रण वाले सिंगापुर पहुंचे। वहां से वे टोक्यो गए। उनके टोक्यो पहुंचने के बाद जापान के प्रधानमंत्री तोजो ने घोषणा की कि जापान भारत पर क़ब्ज़ा करना नहीं चाहता।

बोस सिंगापुर लौट आए। छह जुलाई, 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जापान के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो के साथ सिंगापुर में आईएनए के सैनिकों का निरीक्षण किया। अब बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज का दूसरा चरण शुरू हुआ। वहां उन्होंने दिल्ली चलो का विख्यात नारा दिया। जापानी सरकार से उन्हें सहयोग मिला। उन्होंने इंडिपेंडेंस लीग और आज़ाद हिंद फ़ौज की बागडोर संभाल ली। नेताजी ने आईएनए के सैनिकों की दशा सुधारने के लिए जी-जान लगा दी। सेना का नए ढंग से पुनर्गठन किया। बोस ने आईएनए के सैनिकों की तनख़्वाह बढ़वाई, राशन बेहतर करवाया। वो बिना पूर्व सूचना दिए सैनिकों के साथ भोजन करने चले जाते। गांधी, आज़ाद और नेहरू ब्रिगेड सेना में बनाई गई। प्रवासी भारतीय युवती लक्ष्मी सहगल की सहायता से झांसी की रानी महिला रेजिमेंट भी बनी। बोस के आने के बाद आईएनए के सैनिकों की संख्या बढ़कर 45 हज़ार हो गई थी लेकिन इसमें से 18 हज़ार सैनिकों को दक्षिण एशिया के भारतीय समुदाय के लोगों से सीधी भर्ती के तौर पर लिया गया था।

जब नेताजी की मुलाक़ात जापान की दक्षिणी सेना के कमांडर फ़ील्ड मार्शल हिसाएची तेरावची से हुई तो उन्होंने बताया कि जापानी सेना भारत पर हमला करने की योजना बना रही है। जल्द ही भारत को ब्रिटेन की ग़ुलामी से मुक्त करा लिया जाएगा और भारतीय लोगों को देश की सत्ता सौंप दी जाएगी। बोस ने तेरावची से साफ़ कहा कि भारत पर हमले के समय आईएनए ही अभियान का नेतृत्व करेगी क्योंकि भारत की आज़ादी में भारतीय सैनिकों की भूमिका होना ज़रूरी है। भारत की आज़ादी के लिए बहने वाला पहला ख़ून आईएनए के सैनिक का होना चाहिए।

21 अक्तूबर, 1943 को उन्होंने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार आज़ाद हिंद सरकार और भारतीय राष्ट्रीय सेना (आज़ाद हिन्द फ़ौज़) का गठन किया। उस सरकार को जापान, जर्मनी, क्रोएशिया, इटली, फ़िलीपींस, थाईलैंड और बर्मा ने मान्यता दे दी। बोस इस सरकार के प्रमुख थे, उनके पास युद्ध और विदेश संबंध का प्रभार भी था। आयरलैंड के राष्ट्रपति इयामोन डे वलेरा ने सुभाष बोस को बधाई का संदेश भेजा और दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने आगे बढ़कर पैसों और ज़ेवरों से इस नई सरकार की मदद की।

आज़ाद हिन्द सरकार में रासबिहारी बोस को एक सम्मानित स्थान प्रदान किया गया। रासबिहारी बोस 1915 से जापान में आत्म-निर्वासन भोग रहे थे। अपना अभियान शुरू करने के पहले सुभाष बोस ने गांधीजी का आशीर्वाद प्राप्त किया। गांधीजी से विरोध होने के बावजूद जब वो सिंगापुर से अपना पहला भाषण दे रहे थे, तो गांधीजी को 'राष्ट्रपिता' कह कर संबोधित किया और उनसे आशीर्वाद देने के लिए कहा। 6 जुलाई 1944 को, सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद रेडियो पर गांधीजी को संबोधित करते हुए एक प्रसारण में कहा: 'भारत का स्वतंत्रता का अंतिम युद्ध शुरू हो गया है... हमारे राष्ट्रपिता! भारत की मुक्ति के इस पवित्र युद्ध में, हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ चाहते हैं।'  सुभाष जी की सरकार को जापान, जर्मनी और इटली की मान्यता मिल गई। अस्थाई सरकार ने हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा के रूप में, जय हिन्द को अभिवादन के रूप में, कांग्रेस के तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय झंडा और रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया।

टोक्यो में हुए पूर्व एशिया सम्मेलन में ऐलान किया गया कि ब्रिटेन से छीने गए अंडमान-निकोबार के टापुओं को आज़ाद भारत की अस्थायी सरकार के नियंत्रण में दिया जा रहा है। आईएनए ने कांग्रेस के तिरंगे झंडे को अपना झंडा चुना लेकिन उसने बीच में चरखे की जगह कुलांच भरते हुए चीते को चुना। इसकी प्रेरणा उन्हें 18वीं सदी के मैसूर के राजा और अंग्रेज़ों के सबसे बड़े दुश्मन टीपू सुल्तान से मिली। आईएनए का ध्येय वाक्य था--'एतमाद, इत्तफ़ाक़, क़ुर्बानी,' जिसका अर्थ था विश्वास, एकता और बलिदान।

तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा

4 जुलाई, 1944 को उन्होंने लोकप्रिय नारा दिया, तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा। उनका उद्देश्य भारत की भूमि से अंग्रेज़ों और उनके मित्रों को निकालने के लिए आजीवन संघर्ष करना था। उन्होंने ब्रिटेन और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। बोस ने आज़ाद हिंद फौज के मुख्यालय रंगून और सिंगापुर में बनाए। मई और जून 1944 के बीच आज़ाद हिंद फ़ौज भारतीय भूमि पर सक्रिय रहे। जापान से उन्हें आंडमान और निकोबार टापू प्राप्त हो गए। इनका नाम बदल कर शहीद और स्वराज कर दिया गया। वहां का शासन अस्थायी सरकार ने अपने हाथ में ले लिया।

दुर्भाग्य से सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में भी आजाद हिन्द फौज को जर्मनी और जापान ने वैसा समर्थन और सहयोग नहीं दिया था जिसकी उम्मीद सुभाष चंद्र बोस ने की थी। फिर भी इस फौज ने कई मोर्चों पर बहादुरी से लड़ाई की थी। राजनीतिक रूप से बोस की आईएनए का सबसे अच्छा इस्तेमाल तब होता अगर वो सेना सीधे बंगाल में घुसती जहाँ के लोग उसके स्वागत में सड़कों पर उतर आते लेकिन तब तक जापान की नौसेना कमज़ोर पड़ चुकी थी और बर्मा पर जापान का हवाई नियंत्रण भी ढीला पड़ने लगा था। सुभाष बोस ने उत्तरी बर्मा में जापानी कमांडर जनरल रेन्या मुतागुची को फ़रवरी, 1944 में बताया था, अगर जापानी सेना इम्फ़ाल हमले में सफल हो जाती है और आईएनए के सैनिक असम के मैदानी इलाके में घुस जाते हैं तो भारतीय लोगों और अंग्रेज़ों की भारतीय फ़ौज में सैनिकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी। जब जनवरी 1944 में जापानी जनरल तदाशी काकाकुरा ने कलकत्ता पर बमबारी करने की योजना बनाई तो नेताजी सुभाष बोस ने उसका घोर विरोध किया।

सन 1944 में अप्रैल का मध्य आते-आते लड़ाई का रुख़ बदलने लगा था। आईएनए और जापानी सैनिकों के बीच संबंध ख़राब होने लगे थे। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर दंभी होने का आरोप लगाने लगे थे। जापानी नहीं चाहते थे कि आईएनए की बड़ी टुकड़ी आगे-आगे जाए। वो उनको मुश्किल लक्ष्य देने लगे। उनकी पूरी कोशिश थी कि आईएनए के सैनिकों के मनोबल को गिरा दिया जाए। आईएनए की छापामार इकाई अपनी रसद के लिए पूरी तरह जापानियों पर निर्भर थी। रसद की आपूर्ति न होने पर वो नागा कबीलों के चावल को जंगल की घास के साथ मिलाकर खाने पर मजबूर हुए।

शाहनवाज ख़ान के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज की एक टुकड़ी भारत-बर्मा सीमा पर इंफाल के हमले में मित्र राष्ट्रों से युद्ध करने के लिए भेजी गई। इसने कॉक्स बाज़ार के निकट एक भारतीय चौकी पर अधिकार कर लिया। तिरंगा झंडा लहराया और राष्ट्र गीत गाया। कोहिमा भी फ़ौज के नियंत्रण में आ गया। लेकिन वहां भारतीय सैनिकों के साथ बहुत दुर्व्यवहार हुआ। उन्हें रसद और हथियार से वंचित रखा गया। जापानी सैनिकों के लिए उन्हें निम्न श्रेणी के काम करने के लिए कहा जाता था। इससे उनका मनोबल टूटने लगा। मई, 1944 से जापान की युद्ध में पराजय होने लगी। जापान को बर्मा से पीछे हटना पड़ा। अंग्रेज़ों ने जापानियों के साथ-साथ आज़ाद हिंद फ़ौज के जवानों पर भी काफ़ी अत्याचार किया।

22 जून, 1944 को जापानियों ने आईएनए के शाहनवाज़ ख़ान को वापस लौटने का आदेश दिया। कोहिमा से इस तरह की वापसी किसी भी सेना के लिए बहुत ही मुश्किल काम था। भारी बारिश की वजह से सारे रास्ते मिट चुके थे। आईएनए के सैनिकों ने नए रास्ते बनाए जो घुटने तक कीचड़ से भरे हुए थे जिसमें बहुत से सैनिक फंस गए। क़रीब-क़रीब हर सैनिक दस्त और मलेरिया से पीड़ित था। शाहनवाज़ ख़ान ने अपनी किताब 'माई मेमोरीज़ ऑफ़ आईएनए एंड इट्स नेताजी' में लिखा, "लौटते समय मैंने देखा कि हमारे सैनिक उन घोड़ों का माँस खा रहे थे जो चार दिन पहले मर चुके थे। सड़क के दोनों तरफ़ जापानी और भारतीय सैनिकों की सैकड़ों लाशें पड़ी हुई थीं। ये वो लोग थे जो थकान, भुखमरी या बीमारी की वजह से मारे गए थे। कुछ लोग जो इस अग्निपरीक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पाए थे उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। वो ये किसी कीमत पर नहीं चाहते थे कि वो ब्रिटिश सैनिकों के हत्थे चढ़ें। कितने ही मारे गए और गिरफ़्तार किए गए। आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिक बंदी बना लिए गए। 13 मई की रात शाहनवाज़ ख़ान, जीएस ढिल्लों और आईएनए के 50 सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। आज़ाद हिंद फ़ौज के 20,000 क़ैदियों पर सार्वजनिक मुक़दमे चलाने का निर्णय लिया गया। साथ ही 7,000 को नौकरी से निकालने और बिना मुक़दमा चलाए हिरासत में रखने की कार्रवाई भी की गई।

लालक़िले में मुक़दमा

आईएनए के सैनिकों को दिल्ली के लाल क़िले में रखा गया और उन पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया गया। जब इनसे पूछताछ पूरी हो गई तो इन सबको नज़दीक के सलीमगढ़ क़िले में भेज दिया गया। 27 अगस्त, 1945 की अंग्रेज़ सरकार ने एक प्रेस रिलीज़ जारी की जिसमें कहा गया आईएनए के नेताओं और गंभीर अपराध करने वाले लोगों का कोर्ट मार्शल किया जाएगा ताकि पूरे भारत को उनके 'कारनामों' के बारे में पता चल सके। दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद हुई कैबिनेट की बैठक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने बताया, "ब्रिटिश लोगों के लिए ये बहुत बुरा होगा कि लोगों के बीच ये संदेश जाए कि विद्रोह करना आसान चीज़ थी और इसके गंभीर नतीजे नहीं होंगे, इसलिए सरकार आईएनए के सैनिकों को माफ़ी देने के पक्ष में नहीं है।"

दूसरे विश्व युद्ध के बाद सेंसरशिप हटा दिया गया। इसका नतीजा ये हुआ कि भारतीय लोगों से आईएनए के प्रयासों को छिपाया नहीं जा सका। जैसे ही लोगों को इसके बारे में पता चला लोगों के बीच आईएनए की लोकप्रियता बढ़ती चली गई। अक्तूबर 1945 के बाद जवाहरलाल नेहरू अपनी हर सभा में लोगों से 'जय हिंद' और 'दिल्ली चलो' का नारा लगवाने लगे। उन्होंने अपने मित्र कृष्णा मेनन को लिखा कि आईएनए के लोग बहादुर और योग्य हैं जिनकी राजनीतिक सोच है।

पहला मुक़दमा नवंबर 1945 में लालक़िले में किया गया। इसमें एक हिंदू (पी.के. सहगल), एक मुसलमान (शाहनवाज) और एक सिख (गुरबख्श सिंह ढिल्लों) को एक साथ कठघरे में खड़ा किया गया। आज़ाद हिन्द फौज के क़ैदियों को बहुत ही गुप्त तरीक़े से भारत लाया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल को पता चला कि आज़ाद हिंद फ़ौज के कई अधिकारियों को बड़ी गोपनीयता से दिल्ली लाया गया है। उन पर सैन्य द्रोह का अभियोग लगाया गया है। सरदार ने यह बात गांधीजी को बताई। गांधीजी ने इन अधिकारियों के बारे में वायसराय लॉर्ड वेवेल को पत्र लिखा। श्री सुभाष बाबू द्वारा खड़ी की गई सेना के सैनिकों पर चल रहे मुक़दमे की कार्रवाई को मैं ध्यान से देख रहा हूं। कुछ क़ैदियों को फौजी अदालत में मुकदमा चला कर गोली मार दी गई है। मैं मुकदमे की प्रगति देख रहा हूँ... हालाँकि मेरा हथियारों के बल पर बचाव से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन मैं उन लोगों की बहादुरी और देशभक्ति को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता जो अक्सर हथियारबंद लोगों द्वारा दिखाई जाती है... भारत इन लोगों की पूजा करता है जिन पर मुकदमा चल रहा है। निःसंदेह सरकार के पास जबर्दस्त शक्ति है। परन्तु यदि सर्वव्यापी भारतीय विरोध के बावज़ूद उस शक्ति का उपयोग किया गया, तो वह उस शक्ति का दुरुपयोग होगा। जो कुछ किया जा रहा है, वह उचित नहीं है।

मुक़दमा शुरू होने के एक दिन बाद वायसराय के दूसरे निजी सचिव जॉर्ज एबेल ने गांधीजी के पत्र का जवाब देते हुए लिखा, "आपका पत्र अख़बारों में छपे लेखों पर आधारित है जिसमें तथ्यों को हमेशा सही ढंग से पेश नहीं किया जाता। महामहिम इस विषय पर अपने विचार इसलिए नहीं रख सकते क्योंकि मामला अदालत के विचाराधीन है।"

आज़ाद हिंद फौज बचाव समिति

कांग्रेस कार्यसमिति ने राय व्यक्त की कि कांग्रेस आज़ाद हिन्द फौज के सदस्यों का मुक़दमे में बचाव करे। कांग्रेस ने एक 17 सदस्यीय आज़ाद हिंद फौज बचाव समिति का गठन किया। भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में तेजबहादूर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू, आसफ़ अली और कैलाशनाथ काटजू ने मुकदमे की पैरवी की। नेहरू ने 25 साल बाद बैरिस्टर का अपना लबादा पहना था। सरकार की तरफ से इस मुक़दमे में बेंच में सात लोगों को रखा गया था। ये सब सैनिक अधिकारी थे। मेजर जनरल एलन ब्लेक्सलैंड को इसका प्रमुख बनाया गया था।

गांधीजी सरदार पटेल के साथ इन बंदियों से मिलने दो बार गए, एक बार क़ाबूल लाइन्स में और दूसरी बार लालक़िले में। इनमें आज़ाद हिन्द फौज के संस्थापक जनरल मोहन सिंह, मेजर जनरल शाहनवाज ख़ां, कर्नल हबीबुर्रहमान, मेजर जनरल लोकनाथ, कैप्टन ढिल्लों और लेफ़्टिनेंट लक्ष्मी सहगल आदि प्रमुख थे। देशव्यापी विरोध की लहर तेज़ थी। इस लहर में सभी राजनीतिक दलों के साथ मुस्लिम लीग भी शामिल हो गई। मोहम्मद अली जिन्ना ने इस मामले में पड़ने की कोशिश की। जिन्ना ने शाहनवाज़ ख़ान को संदेश भिजवाया कि अगर वो अपने आपको दूसरे आरोपियों से अलग कर लें तो वो उनकी वकालत करने के लिए तैयार हैं। शाहनवाज़ ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा, 'हम लोग आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं। इस लड़ाई में हमारे बहुत से साथियों ने जान दी है। हम या तो साथ खड़े रहेंगे या साथ मरेंगे'

ये मुक़दमा 5 नवंबर को लाल क़िले की दूसरी मंज़िल के एक बड़े कमरे में शुरू हुआ। सभी अभियुक्त ख़ाकी कपड़े पहनकर आए लेकिन उन पर कोई रैंक नहीं लगा था। मुक़दमा शुरू होने से पहले उन्होंने नेहरू को स्मार्ट सैल्यूट किया। पहले दिन मुक़दमे की कार्रवाई साढ़े पाँच घंटे चली। उस दौरान अभियोजन पक्ष ने तीन अफ़सरों कैप्टन शाहनवाज़ ख़ान, प्रेम सहगल और लेफ़्टिनेंट ढिल्लों के ख़िलाफ़ ब्रिटिश सम्राट के ख़िलाफ़ युद्ध करने का आरोप लगाया। तीनों आईएनए अफ़सरों ने आरोपों का ज़ोरदार खंडन किया। ट्रायल में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे पता चला कि आई.एन.ए. संगठन और जापानी फासीवाद के बीच कोई वैचारिक संबंध नहीं था, और इसका मुख्य मकसद भारत की आज़ादी हासिल करना था। भूलाभाई देसाई ने तर्क दिया कि यह हर भारतीय का अधिकार है, अगर वह ऐसा सही समझे, तो ब्रिटिश ताज के प्रति अपनी वफादारी को त्याग दे और भारत की आज़ादी पाने के लिए मुक्ति सेना में शामिल हो जाए। उन्होंने तर्क दिया, "जब तक आप अपनी आत्मा नहीं बेच देते, तब तक आप यह कैसे कह सकते हैं कि जब आप अपने देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ रहे हैं, तो कोई और वफादारी आपको ऐसा करने से रोक रही है? इसका मतलब है कि अगर ऐसा होता है, तो स्थायी गुलामी के अलावा कुछ नहीं होगा।"

एक विशेष प्रकार की सहानुभूति पूरे देश में चरम पर थी। सहानुभूति सांप्रदायिक सीमाओं को पार कर गई थी। पूरे देश में प्रदर्शनकारी धरने पर बैठ गए। उनके हाथ में बैनर थे, 'आईएनए के देशभक्तों को बचाओ।' इन तीनों के सम्मान में उस साल लाहौर में दीपावली नहीं मनाई गई। बच्चे सड़कों पर नारा लगाते दिखाई दिए, 'आज़ाद फ़ौज छोड़ दो, लाल क़िला तोड़ दो।'  21 नवंबर, 1945 को कलकत्ता में छात्रों ने आज़ाद हिंद फौज के समर्थन में विद्रोह कर दिया। छात्रों के जुलूस पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें दो छात्रों की मृत्यु हो गई। भीड़ ने 15 ब्रिटिश सैनिक वाहनों में आग लगा दी और उन पर नियंत्रण करने के लिए पुलिस को दो बार गोली चलानी पड़ी। दिल्ली में रातों-रात इश्तहार लग गए जिनमें लिखा था 'हर आईएनए सैनिक की शहादत का बदला बीस अंग्रेज़ों के ख़ून से लिया जाएगा।' अंग्रेज़ इस बात से घबरा गए थे कि आज़ाद हिंद फ़ौज की भावना भारतीय सेना में भी फैलती जा रही है। इस मुक़दमे से पूरे देश में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ माहौल बन गया। आईएनए के सैनिकों को कांग्रेस के विरोधी तत्वों जैसे मुस्लिम लीग, भारतीय क्म्युनिस्ट पार्टी, यूनियनिस्ट पार्टी, अकाली दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा का भी समर्थन मिला। बिपिन चंद्रा लिखते हैं, "आशा के विपरीत आईएनए के लोगों को भारतीय सेना का भी समर्थन मिल रहा था। ब्रिटिश सरकार की इनको देशद्रोही दिखाने की कोशिश नाकाम हुई थी।"

31 दिसंबर, 1945 को जजों ने तीनों अभियुक्तों को ब्रिटिश सम्राट के ख़िलाफ़ युद्ध करने का दोषी पाया। सैनिक अदालत ने इन्हें फांसी की सज़ा सुनाई। लेकिन जनविरोध और लोगों के रोष को देखते हुए सरकार ने इन अधिकारियों को रिहा कर दिया। 3 जनवरी, 1946 को कमांडर-इन-चीफ़ ऑचेनलेक ने इन सबकी सज़ा माफ़ कर दी। देश ने I.N.A. के आरोपियों की आज़ादी की मांग की और आखिरकार उसे हासिल कर लिया। नेहरू ने कहा, "यह भारतीय लोगों की इच्छा और भारत में सत्ता संभालने वालों की इच्छा के बीच शक्ति का मुकाबला बन गया था और आखिर में लोगों की इच्छा की ही जीत हुई।"

एक अंग्रेज़ अफ़सर ने ख़ान, सहगल और ढिल्लों को बुलाकर उन्हें सरकार के फ़ैसले की जानकारी दी। वो सभी ये सुनकर अवाक खड़े रह गए। आईएनए के अफ़सरों ने पूछा, अब हमें क्या करना होगा? अफ़सर ने जवाब दिया, आप सभी जा सकते हैं। सबने पूछा कहाँ? अफ़सर ने कहा, अगर दिल्ली में आपके रिश्तेदार हैं तो आप वहाँ चले जाइए, वरना हम लाहौर जाने के लिए आपकी ट्रेन की बुकिंग करा देंगे। उसी शाम तीनों को लाल क़िले की जेल से रिहा कर दिया गया। इन सबको कांग्रेस नेता आसफ़ अली के घर ले जाया गया। एक दिन बाद इन तीनों ने अपने सम्मान में आयोजित एक रैली को संबोधित किया। शाहनवाज़ ख़ान ने कहा, "हम अपनी रिहाई के लिए अपने देशवासियों का शुक्रिया अदा करने आए हैं। पहली बार ब्रिटिश सरकार की ताक़त ने भारत के लोगों की इच्छा के सामने सिर झुकाया है। हमारी इस बात को मान्यता मिली है कि देशवासियों को अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ने का हक़ है।"

अंग्रेज़ों का भारतीय सेना के तीन अधिकारियों का कोर्ट मार्शल करने का फ़ैसला एक बहुत बड़ी भूल साबित हुआ। एक मुसलमान, एक हिंदू और एक सिख, एक तरह से भारत के तीन बड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे और इनके मुक़दमे ने थोड़े समय के लिए ही सही, लेकिन इन तीनों समुदायों को जोड़ने का काम किया। आजादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले सुभाष चन्द्र बोस और उनके शाहनवाज जैसे सहयोगियों एवं बहुत से बहादुर सिपाहियों को हालाँकि उम्मीद के अनुसार सफलता नहीं मिली थी लेकिन उनके प्रति भारतीय जनता के मन में असीम आदर की भावना भर गई थी और सुभाष चंद्र बोस विशेष रूप से युवाओं के पसंदीदा नायक बन गये थे।

कांग्रेस के सशक्त आंदोलन के साथ-साथ सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज की सशस्त्र क्रान्ति ने अंग्रेजी सरकार की मजबूत नींव हिला कर रख दी थी इसलिए जनता भी आजादी की धीमी आहट साफ सुन रही थी।  कुछ दिनों बाद ही भारत के लोगों को सत्ता सौंपने की मुहिम पर चुपचाप काम शुरू हो गया था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ऐलान किया, "मैं उम्मीद करता हूँ कि भारत के लोग ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना पसंद करेंगे। लेकिन अगर वो आज़ाद रहना चाहेंगे तो उनको ये फ़ैसला लेने का हक़ है।"

नेताजी की मृत्यु

नेताजी जीवित हैं या नहीं, यह कोई विश्वस्त रूप से नहीं जानता था। अब तक गांधीजी ने नेताजी की मृत्यु के समाचारों पर अविश्वास किया था। गांधीजी ने नेताजी के बारे में इन फौजियों से समाचार पूछा। कर्नल हबीबुर्रहमान अंत तक नेताजी के साथ विमान में थे। उन्होंने दुर्घटना का विवरण सजीव रूप में गांधीजी के समक्ष किया। उन्होंने बताया, जब अंग्रेज़ों का अत्याचार बढ़ा तो सुभाष जी को बर्मा से हटना पड़ा। दुर्भाग्यवश रंगून से टोक्यो जाते समय प्रातः साढ़े नौ बजे उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसमें आग लग गई। नेताजी काफी जल गए थे। नेताजी के हाथ और शरीर के दूसरे हिस्से बहुत ज़्यादा जल गए थे। परन्तु इसकी परवाह न करके उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरा हाल क्या है? मैंने उनसे कहा कि मैं बिल्कुल ठीक हूं और मुझे लगता है कि मैं बच जाऊंगा। उन्होंने कहा कि मेरी बचने की आशा नहीं है। और उन्होंने मुझे अपना अंतिम संदेश दिया, ‘मैं तो जा रहा हूं, परन्तु मेरे देश वासियों और तमाम संबंधित लोगों से कह देना कि जब तक लक्ष्य सिद्ध न हो जाए तब तक भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई ज़ारी रहनी चाहिए।’ तीसरे प्रहर साढ़े तीन बजे अपराह्न में इस देश भक्त और महान क्रांतिकारी की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को हो गई। वे लगभग अन्त तक होश में रहे। अतिशय पीड़ा की बावज़ूद उनके मुंह से उफ्‌ तक नहीं निकली। दूसरे दिन प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, पहले तो मेरी मान्यता दूसरी थी, परन्तु अब मुझे विश्वास हो गया है कि नेताजी इस दुनिया में नहीं रहे। 

हमारे देश में यह धारणा बन चुकी है कि गांधीजी को नेताजी नापसंद थे। किंतु जो भी गांधीजी के व्यक्तित्व से परिचित है, वह निस्संदेह यह मानेगा कि उनमें ऐसे ओछापन का नितांत अभाव था। नेताजी बोस गांधीजी के लिए पुत्र समान थे। वे तो नेताजी की योग्यता, सच्चाई, त्याग, सूझ-बूझ, कर्तव्यपरायणता और देश भक्ति परम प्रशंसक थे। गांधी विचार की अध्येता सुजाता चौधरी ने "गांधी और सुभाष" कृति में कई ऐतिहासिक तथ्यों एवं दस्तावेजों के आधार पर यह प्रमाणित किया है कि सुभाष चन्द्र बोस गांधीजी की बहुत इज्जत करते थे और गांधीजी सुभाष चन्द्र बोस के प्रति स्नेह भाव रखते थे। 1932 से ही वह कांग्रेस और उसकी सत्ता से अलग थे। वह तो कांग्रेस के चवन्निया सदस्य भी नहीं थे। उन्होंने हज़ारों देशवासियों को पुत्रवत माना तो वे केवल नेताजी से अन्याय करेंगे यह मान लेना तर्कपूर्ण नहीं लगता। हां, यह बात उन्होंने कभी नहीं छिपाई को वे नेताजी की कार्य-पद्धति से सहमत नहीं हो सके। जहां तक गांधीजी और सुभाषजी के मध्य मतभेद का प्रश्न है उसका प्रमुख कारण था की गांधीजी आजादी के आंदोलन में न हिंसक युद्ध (आजाद हिन्द फौज) के समर्थक थे और न जर्मनी और जापान जैसी फासिस्ट ताकतों का सहयोग चाहते थे जबकि सुभाष चन्द्र बोस अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के दुश्मनों का समर्थन लेने और आजाद हिन्द फौज के द्वारा सशस्त्र संघर्ष के प्रबल पक्षधर थे। गांधीजी के प्रति सुभाष चन्द्र बोस का आदर इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि उन्होंने आजाद हिन्द फौज की पहली टुकड़ी का नाम गाँधी ब्रिगेड रखा था और अपने सिपाहियों को कहा था कि देश की आजादी के बाद हम सब गांधीजी के नेतृत्व में समाज की सेवा करेंगे।

जो भी हो, नेताजी की असमय मृत्यु से देश को असीम हानि हुई। ब्रिटेन के खिलाफ लगातार संघर्ष जारी रखने की मुख्य प्रेरणा सुभाष बोस के विदेशों में किए गए कारनामों से मिली। देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ रही एक वास्तविक सेना ने देशभक्तों के मानस पर बहुत ही गहरा प्रभाव डाला। गांधीजी से मिलने के बाद आज़ाद हिन्द फौज के सदस्यों ने भी माना कि अब वे अहिंसा के सैनिक बनकर भारत की सेवा करेंगे। उनमें से कई लोगों ने नोआखाली और बिहार के संकटपूर्ण दिनों में प्रशंसनीय कार्य करके दिखाया भी।

NOTE : आज़ाद हिन्द फ़ौज का एंथम था कदम कदम बढाए जा । इस गीत के रचयिता थे वंशीधर शुक्ल, और संगीत दिया था कैप्टन राम सिंह ठाकुरी।

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मनोज कुमार

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